1857 ki kranti - भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम '1857 की क्रांति हिन्दी में



1857 ki kranti

1857 की क्रांति 

दोस्तों ,
        आज हम प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1857 की क्रांति के बारे में जाने गए यह क्रांति सिपाही विद्रोह और भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है यह क्रांति ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था 1857 की क्रांति का प्रारंभ 29 मार्च 1857 को मंगल पांडे ने मेरठ के बैरकपुर के सदर बाजार छावनी क्षेत्रो में छोटी झडपो तथा आगजनी से प्रारंभ हुआ था । और पुरे देश में फ़ैल गया था यह विद्रोह 10 वर्षो था भारत के विभिन्न क्षेत्रो में चला था 
    विद्रोहियों ने 11 मई 1857 को बहादुरशाह जफर को भारत का बादशाह घोषित किया।  इस क्रांति के समय ब्रिटेन का प्रधानमंत्री पामर्स्टन था।  

      1857 का विद्रोह असफल रहा परन्तु इसका प्रभाव यह हुआ की ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन समाप्त करके ब्रिटिश सरकार ने भारत का शासन प्रत्यक्ष रूप से अपने हाथों में ले लिया। 

क्रांति के कारण 

⚫ लॉर्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति और लॉर्ड बैलेजली की सहायक संधि ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। 
⚫ राजनीतिक कारणों के साथ ही प्रशासनिक कारण भी क्रांति के लिए उत्तरदायी थे। कोई भी भारतीय उच्च पद तक नहीं पहुँच सकता था।
⚫ ईसाई धर्म के प्रचार ने भी भारतीयों के असंतोष को उभारा। 
⚫ अंग्रेजो द्धारा भारत का आर्थिक शोषण भी एक प्रमुख कारण था। भारतीय सैनिक भूराजस्व नीति के कारण दु:खी थे। 
⚫ सैनिको कारणों में ऐसे अनेक बिंदु विधमान थे, जो विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे थे। पदोन्नति से वंचित रखना , भारत की सीमओं से बाहर युद्ध के लिए भेजा जाना तथा देश से बाहर जाने पर अतिरिक्त भत्ता नहीं देना।
  •  फ़ैजाबाद में 1857 के विद्रोह को मौलवी अहमदुल्ला ने अपना नेतृत्व प्रदान किया।  
  •  वी डी सावरकर ने 1857 के विद्रोह को सुनियोजित स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी।
  •  असम में 1857 के विद्रोह के समय वहां के दीवान मनीराम दत्त ने वहाँ के अंतिम राजा के पोते क्न्दपेश्वर सिंह को राजा घोषित कर विद्रोह की शुरुआत की।
⚫ मुगल बादशाह चूँकि भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व करता था इसलिए उसके अपमान में जनता ने अपना अपमान महसूस किया और विद्रोह के लिए मजबूर हुए
⚫ चर्बीयुक्त कारतूस के प्रयोग की बात से सैनिकी में आक्रोश पैदा हुआ। यह 1857 ई.की क्रांति का तात्कालिक कारण था
 कंपनी की भू-राजस्व व्यवस्था ( बंगाल, बिहार, उड़ीसा में 1793 ई. से लागु स्थायी बन्दोबस्त व्यवस्था, मद्रास एवं बम्बई प्रेसिडेंसी में लागु रैयतवाडी व्यवस्था तथा 1822 ई. से गंगा की घाटी उत्तर पश्चिमी प्रान्तों, मध्य भारत के कुछ भाग एवं पंजाब में लाए महालवाडी  व्यवस्था ) ने अधिकांश अभिजात वर्ग को निर्धन बना दिया।
 प्लासी के युद्ध के बाद निरंतर भारत का शोषण होता रहा जो शायद जन असंतोष का सबसे महत्वपूर्ण कारण था।

विद्रोह का आरम्भ  

⚫ 29 मार्च, 1857 को मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी में विद्रोह किया। 10 मई, 1857 को मेरठ के सिपाहियों ने विद्रोह किया।
 मेरठ से विद्रोही सैनिको ने दिल्ली मार्च कर 11 मई, 1857 को बहादुरशाह जफ़र को भारत का बादशाह घोषित किया।
 मेरठ के सैनिको का नेतृत्व बख्त खान ने किया था। धीरे-धीरे 1857 ई. का विद्रोह देश के अन्य क्षेत्रो में भी फैला।
 कानपूर में 5 जून, 1857 को विद्रोह की शुरुआत हुई। यहाँ पर पेशवा बाजीराव द्धितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब ( धोंधू पंत ) ने विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया जिसमे उनकी सहायता तांत्या टोपे ने की।
 लखनऊ में 4 जून, 1857 को विद्रोह की शुरुआत हुई। बेगम हजरत महाल ने अपने अल्पायु पुत्र बिरजिस कदीर को नवाब घोषित किया तथा लखनऊ स्थित ब्रिटिश रेजिडेंसी पर आक्रमण किया। 


1857 से पूर्व सैन्य विद्रोह


वर्ष  स्थान 
1764 ई. पटना 
1806 ई. वेल्लोर 
1824 ई. बैरकपुर 
1844 ई. फिरोजपुर 

असफलता के कारण 

⚫ विद्रोहियों में नेतृत्व की कमी थी। संगठन तथा एकता का आभाव था
 ग्वालियर के सिंधिया, इन्दौर के होल्कर, हैदराबाद के निजाम आदि राजाओ ने अंग्रेजो का खुलकर साथ दिया
 1857 के विद्रोह के असफल होने के तत्काल बाद 'ब्रिटिश क्राउन' ने कंपनी से भारत पर शासन करने के सभी अधिकार वापस ले लिए
 विद्रोह के बारे में जॉन लॉरेंस ने कहा की यदि उनमे ( विद्रोहियों में ) एक भी योग्य नेता रहा होता तो हम सदा के लिए हार जाते
 रुहेलखण्ड में खान बहादुर खान ने 1857 के विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया
 1858 के भारतीय परिषद् अधिनियम द्धारा भारत में कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया। भारत का गवर्नर-जनरल वायसराय कहा जाने लगा


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